रविवार, 4 अक्टूबर 2020

लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल 🙏

 सरदार वल्लभ भाई पटेल :- ‘‘नेहरू जी आइये रिक्शा में बैठ लीजिए !’’ 

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जवाहर लाल नेहरू :- ‘‘नहीं पटेल जी हम खान साहब से जरूरी बातें कर रहे हैं |’’

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सरदार वल्लभ भाई पटेल :- ‘‘ऐसी क्या जरूरी बाते हैं?

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जवाहर लाल नेहरू :- ‘‘यह पाकिस्तान जाने की जिद किए हुए हैं, हम चाहते हैं कि भारत में ही रहें |’’

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सरदार वल्लभ भाई पटेल :- ‘‘तो जाने क्यों नहीं देते, फिर पाकिस्तान बनवाया ही किसलिए |’’

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जवाहर लाल नेहरू :- ‘‘वह तो ठीक है, लेकिन इनके साथ पांच लाख मुस्लिम और पाकिस्तान चले जाएंगे |’’

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सरदार वल्लभ भाई पटेल :- ‘‘तो जाने दीजिए |’’

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जवाहर लाल नेहरू :- ‘‘लेकिन दिल्ली तो खाली हो जाएगी।

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सरदार वल्लभ भाई पटेल :- ‘‘जो लाहौर से हिन्दू आएंगे उनसे भर जाएगी |’’

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जवाहर लाल नेहरू :- '‘नहीं उन्हें मुस्लिमों के घर हम नहीं देंगे, वक्फ बोर्ड को सौंप देंगे |’’

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सरदार वल्लभ भाई पटेल :- ‘‘और लाहौर में जो अभी से मंदिर और डीएवी स्कूल पर कब्जा कर उनके नाम इस्लामिक रख दिए हैं।

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जवाहर लाल नेहरू :- ‘'पाकिस्तान से हमे क्या लेना-देना, हम तो भारत को धर्मनिरपेक्ष देश बनाएंगे |’’

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सरदार वल्लभ भाई पटेल :- ‘‘लेकिन देश का बंटवारा तो धर्म के आधार पर हुआ है| अब यह हिन्दुस्तान हिन्दुओं का है |’’


जवाहर लाल नेहरू :- ‘‘नहीं यह देश कांग्रेस का है. . कांग्रेस जैसा चाहेगी वैसा होगा |’’


सरदार वल्लभ भाई पटेल :- ‘‘इतिहास बदलता रहता है, अंग्रेज भी जा रहे हैं फिर कांग्रेस की हस्ती ही क्या है ? मुस्लिम साढे सात सौ साल में गए, अंग्रेज 200 साल में गए और कांग्रेस 60-70 साल में चली जाएगी और लोग भूल जाएंगे |’’


जवाहर लाल नेहरू :- ‘‘ऐसा कभी नहीं होगा |’’


सरदार वल्लभ भाई पटेल :- ‘‘जरूर होगा, आप मुगल सोच त्याग दें |’’ कहकर पटेल ने रिक्शा चालक से कहा, ‘आप तेज चलिए, हम भी किस मूर्ख से जबान लडा बैठे !’


“इतिहास की अनकही सत्य कहानियां” का एक अंश (एक रिक्शाचालक, धर्मसिंह तोमर की डायरी के आधार पर)


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जय हिंद 🇮🇳🇮🇳🙏🙏।।

शनिवार, 3 अक्टूबर 2020

धर्म के नाम पर फेक id।।।

 नाम / Fake ID में नाम

1 सोहराब/सुनील यादव

2 सरफराज/अमित मिश्रा

3 हामिद कुरैशी/नागेंद्र कुमार पासवान

4 अहमद/ सुरेन्द्र सिंह


अब सुनील यादव(सोहराब)पोस्ट डालता है: "धर्म के नाम पर ब्राह्मणों ने हमेशा हमारा शोषण किया है, कोई देवी देवता नहीं होता हिन्दू धर्म सिर्फ ब्राह्मणों की बकवास है, ये सब बीजेपी और आरएसएस वाले हैं।"


अब शुरू होता है इस नाटक के बाकी तीनों किरदारों का तमाशा, देखिए कमेंट बॉक्स में: 

Comment:


सुरेंद्र सिंह उर्फ(अहमद)-

"ऐ सुनील यादव, खबरदार जो हिन्दू धर्म के बारे में कुछ बोला तुम यादव लोग हिन्दू नहीं हो सकते," (2-4 गाली लिख देता है)।

फिर बारी आती है तीसरे नौटंकी बाज की-


नागेंद्र पासवान उर्फ (हामिद)

नमो बुद्धाय, जय भीम।

"अरे भाई लोगों गाली गलौज क्यों कर रहे सच्चाई तो कड़वी होती ही है, तुम लोग हम दलितों को मंदिर में घुसने नहीं देते हो ये धर्म नहीं पाखण्ड है इससे अच्छा तो इस्लाम है सभी बराबर खड़े हो कर नमाज़ पढ़ते हैं।"

अब तीसरा नौटंकी बाज आता है कमेंट बॉक्स में-


अमित मिश्रा उर्फ (सरफ़राज़)

"हाँ... हाँ... तुम लोग अछूत हो तो क्यों घुसने दे मंदिर में? जाओ इस्लाम ही अपना लो, तुम सब नीच हो, कौन मुंह लगाए तुम्हें।"


जबकि चारों एक ही "समुदाय विशेष" के हैं।

इस के बाद कई हिन्दू यादव ,राजपूत, ब्राह्मण और दलित सभी तुरंत इस कमेंट बॉक्स में अपनी-अपनी जाति के समर्थन में बिना समझे कि  fake id है,आपस में एक दूसरे से लड़ने लगते हैं और हमारे जातिवाद का फायदा उठाने वाले वो चारों हमारी मूर्खता पर अट्टहास लगा कर हँसते हैं।


देश के अंदर -बाहर से दुश्मन घात लगा कर बैठा है मौके की तलाश में, और इस प्रकार हिंदूओं में आपसी फूट डाल कर लड़ाते हैं

विचार करें-

ऐसे लाखों सोहराब और सरफराज दिन रात सोशल मीडिया पर तुम सबको तोड़ने और लड़ाने के लिए काम कर रहे हैं।

जिहाद अपने चरम पर है, हर स्तर से हिंदुत्व को क्षति पहुंचाने पर कार्य हो रहा है वो भी युद्धस्तर पर।

सावधान रहें, सनातनी एक थे, एक हैं और एक रहें।

जय हिंद जय भारत🙏🙏🙏🇮🇳🇮🇳🇮🇳

मंगलवार, 29 सितंबर 2020

हिन्दू योद्धाओं का इतिहास 🚩🚩🚩

 *बाबर ने मुश्किल से कोई 4 वर्ष राज किया। हुमायूं को ठोक पीटकर भगा दिया। मुग़ल साम्राज्य की नींव अकबर ने डाली और जहाँगीर, शाहजहाँ से होते हुए औरंगजेब आते आते उखड़ गया।*

*कुल 100 वर्ष (अकबर 1556ई. से औरंगजेब 1658ई. तक) के समय के स्थिर शासन को मुग़ल काल नाम से इतिहास में एक पूरे पार्ट की तरह पढ़ाया जाता है....*

*मानो सृष्टि आरम्भ से आजतक के कालखण्ड में तीन भाग कर बीच के मध्यकाल तक इन्हीं का राज रहा....!*

*अब इस स्थिर (?) शासन की तीन चार पीढ़ी के लिए कई किताबें, पाठ्यक्रम, सामान्य ज्ञान, प्रतियोगिता परीक्षाओं में प्रश्न, विज्ञापनों में गीत, ....इतना हल्ला मचा रखा है, मानो पूरा मध्ययुग इन्हीं 100 वर्षों के इर्द गिर्द ही है।*

*जबकि उक्त समय में मेवाड़ इनके पास नहीं था। दक्षिण और पूर्व भी एक सपना ही था।*

*अब जरा विचार करें..... क्या भारत में अन्य तीन चार पीढ़ी और शताधिक वर्ष पर्यन्त राज्य करने वाले वंशों को इतना महत्त्व या स्थान मिला है ?*

*अकेला विजयनगर साम्राज्य ही 300 वर्ष तक टिका रहा। हीरे माणिक्य की हम्पी नगर में मण्डियां लगती थीं।महाभारत युद्ध के बाद 1006 वर्ष तक जरासन्ध वंश के 22 राजाओं ने । 5 प्रद्योत वंश के राजाओं ने 138 वर्ष , 10 शैशुनागों ने 360 वर्षों तक , 9 नन्दों ने 100 वर्षों तक , 12 मौर्यों ने 316 वर्ष तक , 10 शुंगों ने 300 वर्ष तक , 4 कण्वों ने 85 वर्षों तक , 33 आंध्रों ने 506 वर्ष तक , 7 गुप्तों ने 245 वर्ष तक राज्य किया ।*

*फिर विक्रमादित्य ने 100 वर्षों तक राज्य किया था । इतने महान् सम्राट होने पर भी भारत के इतिहास में गुमनाम कर दिए गए ।*

*उनका वर्णन करते समय इतिहासकारों को मुँह का कैंसर हो जाता है। सामान्य ज्ञान की किताबों में पन्ने कम पड़ जाते है। पाठ्यक्रम के पृष्ठ सिकुड़ जाते है। प्रतियोगी परीक्षकों के हृदय पर हल चल जाते हैं।*

*वामपंथी इतिहासकारों ने नेहरूवाद का मल भक्षण कर, जो उल्टियाँ की उसे ज्ञान समझ चाटने वाले चाटुकारों...!*

*तुम्हे धिक्कार है !!!*

*यह सब कैसे और किस उद्देश्य से किया गया ये अभी तक हम ठीक से समझ नहीं पाए हैं और ना हम समझने का प्रयास कर रहे हैं।*


एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत हिन्दू योद्धाओं को इतिहास से बाहर कर सिर्फ मुगलों को महान बतलाने वाला नकली इतिहास पढ़ाया जाता है। महाराणा प्रताप के स्थान पर अत्याचारी व अय्याश अकबर को महान होना लिख दिया है। अब यदि इतिहास में हिन्दू योद्धाओं को सम्मिलित करने का प्रयास किया जाता है तो कांग्रेस शिक्षा के भगवा करण करने का आरोप लगाती है। 

*नोट : दबाकर कॉपी-पेस्ट करें.... ताकी इस आलेख का अधिक से अधिक प्रचार-प्रसार हो सके !*

*जय हिंद


गुरुवार, 24 सितंबर 2020

मातृभाषा 🙏🙏

 #हिन्दी_बोलने_का_प्रयास_करें___

ये वो उर्दू के शब्द जो आप प्रतिदिन प्रयोग करते हैं, इन शब्दों को त्याग कर मातृभाषा का प्रयोग करें...


      #उर्दू                #हिंदी

01 ईमानदार       - निष्ठावान

02 इंतजार         - प्रतीक्षा

03 इत्तेफाक       - संयोग

04 सिर्फ            - केवल, मात्र

05 शहीद           - बलिदान

06 यकीन          - विश्वास, भरोसा

07 इस्तकबाल    - स्वागत

08 इस्तेमाल       - उपयोग, प्रयोग

09 किताब         - पुस्तक

10 मुल्क            - देश

11 कर्ज़             - ऋण

12 तारीफ़          - प्रशंसा

13 तारीख          - दिनांक, तिथि

14 इल्ज़ाम         - आरोप

15 गुनाह            - अपराध

16 शुक्रीया          - धन्यवाद, आभार

17 सलाम           - नमस्कार, प्रणाम

18 मशहूर           - प्रसिद्ध

19 अगर             - यदि

20 ऐतराज़          - आपत्ति

21 सियासत        - राजनीति

22 इंतकाम          - प्रतिशोध

23 इज्ज़त           - मान, प्रतिष्ठा

24 इलाका           - क्षेत्र

25 एहसान          - आभार, उपकार

26 अहसानफरामोश - कृतघ्न

27 मसला            - समस्या

28 इश्तेहार          - विज्ञापन

29 इम्तेहान          - परीक्षा

30 कुबूल             - स्वीकार

31 मजबूर            - विवश

32 मंजूरी             - स्वीकृति

33 इंतकाल          - मृत्यु, निधन 

34 बेइज्जती         - तिरस्कार

35 दस्तखत          - हस्ताक्षर

36 हैरानी              - आश्चर्य

37 कोशिश            - प्रयास, चेष्टा

38 किस्मत            - भाग्य

39 फै़सला             - निर्णय

40 हक                 - अधिकार

41 मुमकिन           - संभव

42 फर्ज़                - कर्तव्य

43 उम्र                  - आयु

44 साल                - वर्ष

45 शर्म                 - लज्जा

46 सवाल              - प्रश्न

47 जवाब              - उत्तर

48 जिम्मेदार          - उत्तरदायी

49 फतह               - विजय

50 धोखा               - छल

51 काबिल             - योग्य

52 करीब               - समीप, निकट

53 जिंदगी              - जीवन

54 हकीकत            - सत्य

55 झूठ                  - मिथ्या, असत्य

56 जल्दी                - शीघ्र

57 इनाम                - पुरस्कार

58 तोहफ़ा              - उपहार

59 इलाज               - उपचार

60 हुक्म                 - आदेश

61 शक                  - संदेह

62 ख्वाब                - स्वप्न

63 तब्दील              - परिवर्तित

64 कसूर                 - दोष

65 बेकसूर              - निर्दोष

66 कामयाब            - सफल

67 गुलाम                - दास

68 जन्नत                -स्वर्ग 

69 जहन्नुम             -नर्क

70 खौ़फ                -डर

71 जश्न                  -उत्सव

72 मुबारक             -बधाई/शुभेच्छा

73 लिहाजा़             -इसलीए

74 निकाह             -विवाह/लग्न

75 आशिक            -प्रेमी 

76 माशुका             -प्रेमिका 

77 हकीम              -वैध

78 नवाब               -राजसाहब

79 रुह                  -आत्मा 

80 खु़दकुशी          -आत्महत्या 

81 इज़हार             -प्रस्ताव

82 बादशाह           -राजा/महाराजा

83 ख़्वाहिश          -महत्वाकांक्षा

84 जिस्म             -शरीर/अंग

85 हैवान             -दैत्य/असुर

86 रहम              -दया

87 बेरहम            -बेदर्द/दर्दनाक

88 खा़रिज           -रद्द

89 इस्तीफ़ा          -त्यागपत्र 

90 रोशनी            -प्रकाश 

91मसीहा             -देवदुत

92 पाक              -पवित्र

93 क़त्ल              -हत्या 

94 कातिल           -हत्यारा

95 मुहैया             - उपलब्ध

96 फ़ीसदी           - प्रतिशत

97 कायल           - प्रशंसक

98 मुरीद             - भक्त

99 कींमत           - मूल्य (मुद्रा में)

100 वक्त            - समय

101 सुकून        - शाँति

102 आराम       - विश्राम

103 मशरूफ़    - व्यस्त

104 हसीन       - सुंदर

105 कुदरत      - प्रकृति

106 करिश्मा    - चमत्कार

107 इजाद       - आविष्कार

108 ज़रूरत     - आवश्यक्ता

109 ज़रूर       - अवश्य

110 बेहद        - असीम

111 तहत       - अनुसार


इनके अतिरिक्त हम प्रतिदिन अनायास ही अनेक उर्दू शब्द प्रयोग में लेते हैं, कारण है ये बाॅलिवुड और मीडिया जो एक इस्लामी षड़यंत्र के अनुसार हमारी मातृभाषा पर ग्रहण लगाते आ रहे हैं।


हिन्दी हमारी राजभाषा एवं मातृभाषा हैं इसका सम्मान करें, भाषा बचाईये, संस्कृति बचाईये।🙏🙏🙏

बुधवार, 23 सितंबर 2020

हमारा इतिहास।पार्ट-2


 चोलों ने 2100 वर्ष राज किया

चालुक्यों ने 700 वर्ष राज किया

अहोम राजवंश ने 700 वर्ष राज किया

पल्लवों ने 600 वर्ष राज किया

राष्ट्रकूटों ने 500 वर्ष राज किया

मुग़लों ने केवल 200 वर्ष राज किया 


लेकिन हमारे इतिहास की किताबों में आलीशान मंदिरों और उन्हें बनाने वाले महान शासकों के बारे में कोई जिक्र नहीं है ।

वहीं 40000 मंदिरों को तोड़ने वाले मुगलों की महानता के झूठी कसीदों से आखिरी पन्ना भी अछूता नहीं है ।



दलित-मुस्लिम केमेस्ट्री।।।

 #Unwinding_History_part1


दलित - मुस्लिम केमेस्ट्री की एक दर्दनाक कहानी  --------------------------------------------


आज बात हो रही है , अविभाजित भारत में अंबेडकर से भी बड़े एक दलित नेता, दलित-मुस्लिम राजनीति के जादूगर, जिन्ना के बेहद विश्वासपात्र और पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री – जोगेंद्र नाथ मंडल की।


बताया जाता  हैं कि पाकिस्तान बनने के कुछ ही समय बाद वहां गैर मुस्लिमो को निशाना बनाया जाने लगा।हिन्दुओ के साथ लूटमार, बलात्कार की घटनाएं होने लगी तो मंडल ने इस विषय पर सरकार को कई पत्र लिखे।लेकिन सरकार ने उनकी एक न सुनी। जोगेंद्र नाथ मंडल को बाहर करने के लिए उनकी देशभक्ति पर संदेह किया जाने लगा। मंडल को इस बात का एहसास हुआ कि जिस पाकिस्तान को उन्होंने अपना घर समझा था वो उनके रहने लायक नहीं है।मंडल बहुत आहत हुए क्योंकि उन्हें यकीन था कि पाकिस्तान में दलितों के साथ अन्याय नहीं होगा। तकरीबन दो सालों में ही दलित - मुस्लिम एकता का मंडल का ख्बाब टूट गया था, जिसके बाद वो 1950 में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को अपना इस्तीफा देकर भारत लौट आए ।और अंतिम समय तक भारत में ही रहे ।


असल में देवेंद्र नाथ मंडल 1940 में कुछ मतभेदों के कारण कांग्रेस पार्टी छोड़कर – मुस्लिम लीग के साथ जुड़ गये। मुसलमानो के वर्चस्व वाली मुस्लिम लीग में जोगेंद्र नाथ मंडल जैसे एक दलित नेता के जुड़ने से मानो जिन्ना और दूसरे मुस्लिम लीग के नेताओं को लगने लगा कि उनकी स्वीकार्यता अब दलित समुदाय में भी बन सकती है। जिन्ना को इस बात का बखूबी अंदाज़ा था कि मुस्लिम लीग में मंडल की मौजूदगी ‘पाकिस्तान मूवमेंट’ को कैसे फायदा पहुंचा सकती है।इसी वजह से मंडल कुछ ही समय में जिन्ना के बेहद खास हो गए और पार्टी में उनका कद शीर्ष के नेताओं में शुमार हो गया.


मंडल और मुस्लिम लीग के साथ आने के कारण भारत में ‘दलित-मुस्लिम’ राजनीति का एक नया प्रयोग शुरू हुआ।


मंडल को भ्रम हो गया था कि “भारत की तुलना में जिन्ना के पाकिस्तान में अनुसूचित जाति की स्थिति बेहतर होगी” ।


चूँकि मुस्लिम लीग का मकसद भारत का ज्यादा से ज्यादा भाग बाँटकर कर पाकिस्तान के नक़्शे को बड़ा करना था इसलिए उन्होंने मंडल को प्रत्येक मौक़ों पर पार्टी के खास नेता के रूप में पेश किया । लीग के नेता यह बखूबी जानते थे कि केवल मुसलमानों की राजनीति से पाकिस्तान का नक्शा बड़ा नहीं होगा इसके लिए जरूरी है कि दलितों को भी साथ रखा जाए।


लेकिन मुस्लिम लीग और जोगेंद्र नाथ मंडल की --‘दलितों और मुसलमानो का पाकिस्तान’ वाली सोच से अंबेडकर गहरा विरोध रखते थे। अंबेडकर भारत विभाजन के विरोध में थे। वे दलितों के लिए भारत को ही उपयुक्त मानते थे और उनका कहना था कि --“यदि भारत का बँटवारा मज़हबी आधार पर हो रहा है तो जरूरी है कि कोई भी मुसलमान भारत में ना रहे और पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं को भी भारत आ जाना चाहिए, वर्ना समस्याएं बनी रहेंगी।”

इसलिए आगे चलकर अंबेडकर ने मंडल से किनारा कर लिया।


पाकिस्तान में दलितों के हितों का सबसे अधिक ध्यान रखा जाएगा” इस तरह के मंडल के बयानों  ने पिछड़ी जातियों के वोटों को पाकिस्तान के पक्ष में कर लिया और इस तरह जोगेंद्र नाथ मंडल की सहायता से जिन्ना भारत के बड़े हिस्से को पाकिस्तान के नक्क्षे में समाहित करने में सफल हो गये।


पाकिस्तान के नक़्शे को बड़ा करने के लिए मुस्लिम लीग ने जिस तरह मंडल का इस्तेमाल किया वह बॉलीवुड फ़िल्मो की उन कहानियों जैसा ही था ‘जिसमे एक विलेन किसी बच्चे को किडनैप करने के लिए चॉकलेट की लालच देकर अपने पास बुलाता है और फिर अपना असली रंग दिखाना शुरू करता है।’


बँटवारे के बाद  मंडल एक बड़ी दलित आबादी लेकर पाकिस्तान चले गए। जिन्ना ने भी उनके कर्ज को उतारते हुए उन्हें पाकिस्तान के पहले कानून और श्रम मंत्री का पद दे दिया. मंडल ने सोंचा कि “अब पाकिस्तान आकर दलितों के लिए अच्छे दिन आ गए।” लेकिन हुआ कुछ उल्टा।


मंडल के कहने पर भले ही दलितों के एक तबके ने अपने आप को हिंदुओं से अलग बता कर पाकिस्तान चले जाना सही समझा लेकिन कट्टरपंथी मुसलमानों के लिए ऊँची जाति के हिंदुओं और दलितों में कोई फर्क न था।


पाकिस्तान में धीरे-धीरे दलित हिंदुओं पर अत्याचार होने शुरू हो गए और मंडल की अहमियत भी ख़त्म कर दी गई। दलितों की निर्ममतापूर्वक हत्याएँ, जबरन धर्म-परिवर्तन, संपत्ति पर जबरन कब्ज़ा और दलित बहन-बेटियों की आबरू लूटना, यह सब पाकिस्तान में रोज की और ‘आम बात’ हो चुकी थी।


इस पर मंडल ने मोहम्मद अली जिन्ना और अन्य नेताओं से कई बार बात भी की लेकिन इसका कोई फायदा न हुआ ।


बँटवारे के बाद पाकिस्तान में बचे ज्यादातर दलित या तो मार दिए गए या फिर मजबूरी में उन्होंने इस्लाम अपना लिया।इस दौरान दलित अपने ही नेता और देश के कानून मंत्री के सामने मदद के लिए चीखते-चिल्लाते रहे, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।


पाकिस्तानी सरकार ने दलित हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों की कोई सुध नहीं ली।


मंडल यह सब देखकर ‘दलित-मुस्लिम राजनीतिक एकता’ के असफल प्रयोग के लिए खुद को कसूरवार समझे लगे।

और अंत में  8 अक्टूबर 1950 को मंडल,पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के मंत्री-मंडल से त्याग पत्र देकर भारत आ गये।


गए थे लाखों अनुयायियों को लेकर लेकिन आये तो अकेले शरणार्थी बनकर। सारे दलित वहीं रह गए हैं जो मंडल के कहने पर अपना देश छोड़ कर चले गए थे।‘दलित-मुस्लिम एकता’ की कीमत आज तक वह आबादी चुका रही है।वे रोज बेइज्जत हो रहे हैं, धर्म बदल रहे हैं, अपमान के घूंट पी रहे हैं, मैला उठा रहे हैं, भेदभाव का शिकार हो रहे हैं, मानो हर दिन मर-मर के जी रहे हैं।

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हिन्दू वीरो की विजय गाथा🚩🚩🚩

 जब अटक से कटक तक लहराने लगा था भगवा झन्डा ............


आप जब विदेशी मुस्लिम शासकों के समय की इतिहास की पुस्तकें पढ़ेंगे तो दिखाई देगा कि कोई भी अरबी या मुगल शासक एक बड़े क्षेत्र या भारत का शासक नहीं रहा है.


यह बात थोड़ी झूठी लगती है कि मुस्लिमों ने भारत पर 400 साल तक राज किया है. आज हम आपको भारत के ऐसे इतिहास के अध्याय के बारें में बताने वाले हैं, जो आज किताब से ही फाड़ दिया गया है ताकि कोई भी इसे पढ़ नहीं पाए-


हिन्दू वीरों की विजयगाथा –


अफ़गानिस्तान के अटक से लेकर कटक तक और दाख्खान से दिल्ली तक मुस्लिम शासन को हिन्दू योद्धाओं ने उखाड़ फेंका था.


अफ़गानिस्तान पर आक्रमण करके मराठा सेना ने 45000 पठानो को काट दिया था और गांधार पर भगवा लहराया था. दिल्ली का गौरी शंकर मंदिर आज भी उस वीर हिदू गाथा का गवाह है जब वीर हिन्दू नायक बाजीराव पेशवा प्रथम ने मुगलों की ईंट से ईंट बजा कर दिल्ली पर भगवा झंडा फहराया था और 800 पुराने गौरी शंकर मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था.


(प्रमाण के लिए आप पुस्तक भारतीय संघर्ष का इतिहास पढ़ सकते हैं जिसके लेखक डा. नित्यानंद हैं.)


आइये पढ़ते हैं असली इतिहास..........


1719 के आसपास पेशवा बालाजी विश्वनाथ अपनी सेना लेकर दिल्ली आये थे और यहाँ इन्होने दिल्ली की राजनीति में सैयद बंधुओं की सहायता की थी. इसी का परिणाम यह हुआ था कि दक्षिण के क्षेत्र पर चौथ व सरदेशमुखी वसूल करने का अधिकार प्राप्त किया था.


यहाँ पर सैयद बंधुओं के साथ कुछ संधियाँ भी हुई थीं-


1. शाहू को शिवाजी के वे प्रदेश लौटा दिये जायेंगे, जिन्हें वह ‘स्वराज’ कहता था.


2. हैदराबाद, गोंडवाना, ख़ानदेश, बरार एवं कर्नाटक के वे प्रदेश भी शाहू को वापस कर दिये जायेंगे, जिन्हे मराठों ने हाल ही में जीता था.


3. दक्कन के प्रदेश में मराठों को ‘चौथ’ एवं ‘सरदेशमुखी’ वसूल करने का अधिकार होगा, जिसके बदले मराठे क़रीब 15,000 जवानों की एक सैनिक टुकड़ी सम्राट की सेवा हेतु रखेंगे.


4. शाहू मुग़ल सम्राट को प्रतिवर्ष लगभग दस लाख रुपये का कर खिराज देगा.


5. मुग़ल क़ैद से शाहू की माँ एवं भाई समेत सभी सगे-सम्बन्धियों को आज़ाद कर दिया जायेगा.


इसके बाद पेशवा बालाजी विश्वनाथ उन्नीस वर्ष की उम्र में ही पेशवा बने और इन्होनें मालवा, गुजरात और चम्बल का क्षेत्र जीत लिया.


ऐसा बोला जाता है कि इनका अधिकाश समय घोड़े की पीठ पर ही बिता था. पेशवा बालाजी विश्वनाथ के काल में रघूजी भोंसले ने उड़ीसा जीत लिया था और बिहार व बंगाल में चौथ वसूल की थी. साथ ही साथ तुकाजी होलकर व साबाजी सिंधिया ने अटक तक विजय प्राप्त कर ली थी. इस प्रकार इन भारतीय वीर योद्धाओं ने विदेशी मुस्लिम शासकों की जड़ ही हिला दी थी.


अटक से कटक तक हिन्दुओं का भगवा झंडा ही लहरा रहा था. दिल्ली का बादशाह भी बस नाममात्र का हो गया था. असली शासन तो मराठों के हाथ में आ गया था.


अब आप ही बतायें कि जब हमारी पुस्तकें यह इतिहास नहीं बतायेंगी तो क्या हमारी किताबों को झूठा नहीं बोला जाएगा? आज भारत के युवाओं को भारत का असली इतिहास पढने की विशेष आवश्यकता है.


रविवार, 20 सितंबर 2020

हमारा भारतवर्ष।।


 मैं बहुत सोचता हूं पर उत्तर नहीं मिलता ... आप भी इन प्रश्नों पर गौर करना कि.......🚩🚩


१. जिस सम्राट के नाम के साथ संसार भर के इतिहासकार “महान” शब्द लगाते हैं...

२. जिस सम्राट का राज चिन्ह #अशोकचक्र भारत देश अपने झंडे में लगता है.....

३.जिस सम्राट का राज चिन्ह चारमुखी शेर को भारत देश राष्ट्रीय प्रतीक मानकर सरकार

चलाती है और सत्यमेव जयते को अपनाया गया।

४. जिस देश में सेना का सबसे बड़ा युद्ध सम्मान सम्राट अशोक के नाम पर अशोक चक्र दिया जाता है ...

५. जिस सम्राट से पहले या बाद में कभी कोई ऐसा राजा या सम्राट नहीं हुआ, जिसने अखंड भारत (आज का नेपाल, बांग्लादेश, पूरा भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान) जितने बड़े भूभाग पर एक छत्री राज किया हो ...

६. जिस सम्राट के शासन काल को विश्व के बुद्धिजीवी और इतिहासकार भारतीय इतिहासका सबसे स्वर्णिम काल मानते हैं ...

७.जिस सम्राट के शासन काल में भारत विश्व गुरु था, सोने की चिड़िया था, जनता खुशहाल और भेदभाव रहित थी ... 

८. जिस सम्राट के शासन काल जी टी रोड जैसे कई हाईवे रोड बने, पूरे रोड पर पेड़ लगाये गए, सराये बनायीं गईं इंसान तो इंसान जानवरों के लिए भी प्रथम बार हॉस्पिटल खोले गए, जानवरों को मारना बंद कर दिया गया ...

ऐसे महान #सम्राटअशोक कि जयंती उनके अपने देश भारत में क्यों नहीं मनायी जाती, न कि कोई छुट्टी घोषित कि गई है अफ़सोस जिन लोगों को ये जयंती मनानी चाहिए, वो लोग अपना इतिहास ही नहीं जानते और जो जानते हैं.. वो मानना नहीं चाहते ।

1. जो जीता वही चंद्रगुप्त ना होकर जो जीता वही सिकन्दर “कैसे” हो गया… ? (जबकि ये बात सभी जानते हैं कि…सिकंदर की सेना ने #चन्द्रगुप्तमौर्य के प्रभाव को देखते हुये ही लड़ने से मना कर दिया था.. बहुत

ही बुरी तरह मनोबल टूट गया था… जिस कारण , सिकंदर ने मित्रता के तौर पर अपने सेनापति सेल्युकश कि बेटी की शादी चन्द्रगुप्त से की थी)

2. #महाराणाप्रताप ”महान” ना होकर ... अकबर ”महान” कैसे हो गया…? जबकि, अकबर अपने हरम में हजारों लड़कियों को रखैल के तौर पर रखता था ... यहाँ तक कि उसने अपनी बेटियो और बहनोँ की शादी तक पर प्रतिबँध लगा दिया था जबकि.. महाराणा प्रताप ने अकेले दम पर उस अकबर के लाखों की सेना को घुटनों पर ला दिया था) 

3. #सवाईजयसिंह को “महान वास्तुप्रिय” राजा ना कहकर शाहजहाँ को यह उपाधि किस आधार मिली.. ? जबकि… साक्ष्य बताते हैं कि…. #जयपुर के हवा महल से लेकर तेजोमहालय {ताजमहल} तक …. महाराजा जय सिंह ने ही बनवाया था.!

4. जो स्थान महान मराठा #क्षत्रियवीरशिवाजी को मिलना चाहिये वो … क्रूर और आतंकी औरंगजेब को क्यों और कैसे मिल गया ..? 

5. स्वामी विवेकानंद और आचार्य

चाणक्य की जगह… विदेशियों को हिंदुस्तान पर क्यों थोप दिया गया…? 

6. तेजोमहालय- ताजमहल  ..लालकोट- लाल किला .. फतेहपुर सीकरी का देव महल- बुलन्द दरवाजा ... एवं सुप्रसिद्ध गणितज्ञ वराह मिहिर की मिहिरावली(महरौली) स्थित वेधशाला- कुतुबमीनार .. क्यों और कैसे हो गया ...?

7. यहाँ तक कि….. राष्ट्रीय गान भी… संस्कृत के वन्दे मातरम की जगह गुलामी का प्रतीक जन-गण-मन हो गया है कैसे और क्यों हो गया ..?

8. और तो और…. हमारे आराध्य भगवान् राम.. कृष्ण तो इतिहास से कहाँ और कब गायब हो गये पता ही नहीं चला … आखिर कैसे ? 

9. यहाँ तक कि…. हमारे आराध्य भगवान राम की जन्मभूमि पावन अयोध्या … भी कब और कैसे विवादित बना दी गयी… हमें पता तक नहीं चला…

कहने का मतलब ये है कि… हमारे दुश्मन सिर्फ….बाबर, गजनवी, तैमूरलंग ...ही नहीं हैं … बल्कि आज के सफेदपोश तथाकथित सेक्यूलर भी हमारे उतने ही बड़े दुश्मन हैं!

गुरुवार, 6 अगस्त 2020

हमारा इतिहास।।

भविष्य की पीढ़ियों को सही इतिहास बताएं और सिखाएं। अब तक हमें झूठे अभिनेताओं, लेखकों, विधर्मियों के साथ नकली इतिहास पढ़ाया जाता था। 16 साल की #मुलराजा सोलंकी ने #मुहम्मद गौरी को इतनी बुरी तरह हराया कि उसकी सेना के अधिकांश लोग हिंदू धर्म में परिवर्तित हो गए।

गुजरात के #चालुक्य ही सोलंकी कहे जाते हैं। मोहम्मद गोरी के समय अन्हिल पट्टन पर अल्पव्यस्क मूलराज नामक शासक का शासन था। मूलराज की माता रानी नायका अपने अल्पवयस्क पुत्र की संरक्षिका के रूप में यहां शासन कर रही थी। रानी #नायका बहुत ही कुशल नीतिनिपुण और कूटनीतिज्ञा थीं। उन्हें नारी समझकर ही गौरी ने अन्हिलवाड़ा पर 1175 ई. में आक्रमण कर दिया।
रानी के समक्ष अपने स्वर्गीय राजा के पश्चात परीक्षा की विकट घड़ी आ उपस्थित हुई। वह अपने पति, अपनी प्रजा और अपने देश के प्रति अपने कर्तव्य भाव से भर उठी। रानी विदेशी आततायी आक्रांता को धूल चटाने की योजना बनाने लगी। उस समय गुजरात का प्रमुख सोलंकी भीमदेव था। उसने रानी नायका की सहायता के लिए अपनी सेवाएं दीं और स्वयं ही नहीं अपितु कई राजाओं को लेकर वह विदेशी शासक के विरूद्घ युद्घ के मैदान में आ डटा। इतना ही नहीं रानी नायका ने भी अपनी एक अनोखी योजना पर कार्य किया। वह अपनी पीठ पर अपने अल्पवयस्क राजकुमार को बांधकर लायी और युद्घ के मैदान में चण्डी बनकर कूद पड़ी। इस घटना का उल्लेख वीर सावरकर जी ने अपनी पुस्तक ‘भारतीय इतिहास के छह स्वर्णिम पृष्ठ’ में इस प्रकार किया है:-
‘गुजरात के मुख्य राजा की मृत्यु हो जाने से वहां की रानी और सैनिक अधिकारियों ने मृत राजा के बहुत ही छोटे बच्चे को उस राज्य पर बिठा दिया था। इसलिए मोहम्मद को वह राज्य दुर्बल दिखाई पड़ा और उसने उस पर चढ़ाई कर दी। किंतु आपातत: दीखने वाली इस दुर्बल परिस्थिति ने मोहम्मद के छक्के छुड़ा दिये। मोहम्मद की चढ़ाई होते देख गुजरात की हिंदू सेना स्वयं आगे बढ़कर आबू पहाड़ के आस-पास तक आ धमकी। कहना न होगा कि उनसे सहानुभूति रखने वाले कुछ हिंदू राजाओं ने भी उसे इस पहल में पूरी सहायता की। रानी ने वहां बड़ी शूरता के साथ सामना किया। वह अपने लाडले नन्हे राजा को हिंदू सेना के सामने ले आयी और इन शब्दों में उन सबका आह्वान किया कि यह बाल राजा आप लोगों की गोद में डाल रही हूं। प्राणपण से इसकी रक्षा कीजिए। तत्काल आग भड़क उठी और वह सारी हिंदू सेना और आस-पास के सहायक हिंदू नरेश भी मोहम्मद के साथ इतने आवेश से लड़े कि मार से मात खाकर उसकी सारी सेना दशों दिशाओं में भाग निकली। बड़े कष्ट से मोहम्मद गोरी प्राण बचाकर जो भागा तो अपने अधीन सीमा प्रदेश में ही जाकर रुका।’
रानी को दो सम्मान
गजनवी के पश्चात मोहम्मद गोरी का गुणगान करना वर्तमान भारतीय इतिहास का एक बहुत बड़ा छल है। उस छल को देखकर तो ऐसा लगता है कि जैसे बीच के काल में #भारत मर ही गया था। गोरी जैसे क्रूर शासकों के क्रूर कृत्यों का वंदन इस प्रकार किया गया है कि जैसे वह बहुत बड़ा महात्मा हो। इस पर पी.एन. ओक लिखते हैं-
‘क्या भारत में पवित्र उपदेशों का अकाल और अभाव था? क्या भारत के पास कृष्ण की #गीता, शंकराचार्य का एकेश्वरवाद वेद और #उपनिषद नहीं था?’
✍️ राकेश कुमार आर्य

लाल किले का सच।।

लाल_किले_का_सच...

अक्सर हमें यह पढाया जाता है कि दिल्ली का लाल किला शाहजहाँ ने बनवाया था। लेकिन कहीं यह एक सफ़ेद झूठ तो नहीं। दिल्ली का लाल किला शाहजहाँ के जन्म से सैकड़ों वर्ष पूर्व “महाराज अनंगपाल तोमर द्वितीय” द्वारा दिल्ली को बसाने के क्रम में ही बनाया गया था। इस क्रम में एक विशेष बात यह ज्ञात होती है कि महाराज अनंगपाल तोमर कोई और नहीं बल्कि महाभारत के अभिमन्यु के वंशज तथा महाराज पृथ्वीराज चौहान के नाना जी थे।

लाल किले का असली नाम #लाल_कोट है, जिसे महाराज अनंगपाल द्वितीय द्वारा सन 1060 ईस्वी में दिल्ली शहर को बसाने के क्रम में ही बनवाया गया था जबकि शाहजहाँ का जन्म ही उसके सैकड़ों वर्ष बाद 1592 ईस्वी में हुआ है। दरअसल शाहजहाँ ने लाल किला को बनाया या बसाया नहीं अपितु इसे बुरी तरह से नष्ट करने की असफल कोशिश की थी ताकि, लालकिला स्वयं उसके द्वारा बनाया साबित हो सके। लेकिन सच सामने आ ही जाता है।
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साक्ष-परीक्षा:

इसका सबसे बड़ा प्रमाण तो यही है कि तारीखे फिरोजशाही के पृष्ट संख्या 160 (ग्रन्थ 3) में लेखक लिखता है कि सन 1296 के अंत में जब अलाउद्दीन खिलजी अपनी सेना लेकर दिल्ली आया तो वो कुश्क-ए-लाल ( लाल प्रासाद/महल ) की ओर बढ़ा और वहां उसने आराम किया।

सिर्फ इतना ही नहीं अकबरनामा में इस बात के वर्णन हैं कि महाराज अनंगपाल ने ही एक भव्य और आलिशान दिल्ली का निर्माण करवाया था।

शाहजहाँ से 250 वर्ष पूर्व ही 1398 ईस्वी में एक अन्य जेहादी तैमूरलंग ने भी पुरानी दिल्ली का उल्लेख किया हुआ है (जो कि शाहजहाँ द्वारा बसाई बताई जाती है)।

यहाँ तक कि लाल किला के एक खास महल मे सुअर (वराह) के मुँह वाले चार नल अभी भी लगे हुए हैं। 
इस्लाम मे सुअर हराम है। इनका यहां क्या काम ? वराह विष्णु अवतार का प्रतीक चिन्ह है सनातन के प्रमाण?

ऐसे किले के एक द्वार पर बाहर हाथी की मूर्ति अंकित है क्योंकि राजपूत राजा गजो (हाथियों) के प्रति अपने प्रेम के लिए विख्यात थे जबकि इस्लाम जीवित प्राणी के मूर्ति का विरोध करता है।
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लाल किले का सच:

यही नहीं लाल किला के दीवाने खास मे केसर कुंड नाम से एक कुंड भी बना हुआ है। जिसके फर्श पर हिंदुओं के पूज्य कमल पुष्प अंकित है। साथ ही ध्यान देने योग्य बात यह है कि केसर कुंड एक हिंदू शब्दावली है। जो कि हमारे राजाओ द्वारा केसर जल से भरे स्नान कुंड के लिए प्राचीन काल से ही प्रयुक्त होती रही है।

उल्लेखनीय तथ्य ये है कि मुस्लिमों के प्रिय गुंबद या मीनार का इस महल में कोई अस्तित्व तक नही है
लाल किला के दीवानेखास और दीवानेआम मे।
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इतना ही नहीं दीवानेखास के ही निकट राजा की न्याय तुला अंकित है जो ब्राह्मणों द्वारा उपदेशित राजपूत राजाओ की न्याय तुला चित्र से प्रेरणा लेकर न्याय करना हमारे इतिहास मे प्रसिद्द है। 
दीवाने ख़ास और दीवाने आम की मंडप शैली पूरी तरह से 984 ईस्वी के अंबर के भीतरी महल (आमेर/पुराना जयपुर) से मिलती है जो कि राजपूताना शैली मे बना हुई है। आज भी लाल किला से कुछ ही गज की दूरी पर बने हुए देवालय हैं जिनमे से एक लाल जैन मंदिर और दूसरा गौरीशंकर मंदिर हैं और दोनो ही गैर मुस्लिम है जो कि शाहजहाँ से कई शताब्दी पहले राजपूत राजाओं के बनवाए हुए है।

शाहजहाँ या एक भी इस्लामी शिलालेख मे आखिर लाल किला का वर्णन क्यों नही मिलता है ?

इतिहास में कहा गया, दिल्ली शाहजहाँ ने बसाई। किन्तु लालकिले के आसपास के घरों की निर्माण शैली राजपूताना में है।
ये कैसे सम्भव है कि शाहजहाँ ने सिर्फ लालकिला मुगल शैली में बनाया और बाकी नगर हिन्दू शैली में ? 

वास्तविकता ये है कि लाल किला और दिल्ली दोनो ही हिन्दू राजा अनंगपाल ने बनाया। 1060 ईसवी के आसपास।
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“गर फ़िरदौस बरुरुए ज़मीं अस्त, हमीं अस्ता, हमीं अस्ता, हमीं अस्ता” – अर्थात इस धरती पे अगर कहीं स्वर्ग है तो यही है, यही है, यही है।
इस अनाम शिलालेख के आधार पर लाल किला को शाहजहाँ द्वारा बनवाया गया करार दिया गया, 
जबकि पद्मावती के उल्लेख करते हुए शिलालेख को नकारकर पद्मावती को काल्पनिक बता दिया गया।

किसी अनाम शिलालेख के आधार पर कभी भी किसी को किसी भवन का निर्माणकर्ता नहीं बताया जा सकता और ना ही ऐसे शिलालेख किसी के निर्माणकर्ता होने का सबूत ही देते हैं।

लालकिले को एक हिन्दू प्रसाद साबित करने के लिए आज भी हजारों साक्ष्य मौजूद हैं। यहाँ तक कि लाल किला से सम्बंधित बहुत सारे साक्ष्य पृथ्वीराज रासो से ही मिलते है।
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सरांस यही है कि लाल किले का निर्माण शाहजहाँ के द्वारा नहीं किया गया था बल्कि शाहजहाँ ने इस पूर्व महल में हेर फेर करके उसे अपना नाम देने कि कोशिश भर की थी। सत्य को अधिक दिनों तक छिपाया नही जा सकता, यह उक्ति यहाँ बखूबी लागु होती है।

स्रोत- प्रसिद्ध इतिहासकार पी. ऐन. ओक की किताब "इतिहास की भयंकर भूले से"